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Sunday, 15 August 2021

The right way to raise your child from conception to birth

                                         परवरिश (बस इतना ही करना है)


परवरिश जब भी यह शब्द सुनने या कहने में आता है,एक ही क्षण में भूत वर्तमान और भविष्य तीनों काल जैसे एक ही फ़्रेम में फिट हो जातें हैं ।
हमारा आज और आने वाला कल बहुत सी बातों को दर्शाता है और उन्हीं बातों पर निर्भर भी करता है।अपने पाठकों के लिए यह लेख मैं यूँही नहीं लिख रही हूँ ।इस एक शब्द को साकार करने में दो दशक मुझे भी लगे हैं ।और पालन पोषण की मेरी इस यात्रा का अनुभव आपके साथ साँझा कर रही हूँ ।


अक्सर लोग मानते हैं कि किसी भी बच्चे की परवरिश उसके जन्म से शुरू होती है,पर ऐसा नहीं है ।उसकी शिक्षा संस्कार माँ के पेट से शुरू होता है,माता पिता का संभोग भ्रूण की स्थापना और उसका पल पल गर्म में बढ़ना,हर समय मां का चिंतन मनन ज़रूरी है ।परमात्मा के ध्यान के साथ इस बात का भी ध्यान ज़रूरी है कि आपके गर्भ में पल रहा बच्चा सिर्फ़ आपके खाने और दवाओं से ही पल रहा,आपकी सोच आपके विचार आपका आचार व्यवहार हर चीज़ का असर बच्चे पर पड़ता है ।संभोग के समय माता पिता के भाव आधार होते हैं किसी बच्चे के व्यक्तित्व का,एक निश्छल संभोग एक निश्छल बालक का बीजारोपण है,केवल कामेच्छा की पूर्ति के लिए किया गया संभोग एक स्वार्थी बालक का आधार होगा।
कामेच्छा को पूरा करने के लिए सारा जीवन होता है,यदि किसी उत्पत्ति के लिए प्रयास करें तो दिन समय हर बात का ध्यान रखना होगा ।हिंदू धर्म के कई ग्रंथों में इसकी व्याख्या है।रावण संहिता में भी पूरा उल्लेख है।
गर्भवती महिला को न सिर्फ़ अपने खाने का अपितु मंत्रों का उच्चारण तथा लेखन दोनो का निरंतर अभ्यास करना चाहिए ।खाने का पहला टुकड़ा हमेशा छोटा खाना चाहिए ।अपने गर्भ में पल रहे बच्चे से निरंतर संपर्क बनाए रखना चाहिए ।और उससे हर बात करनी चाहिए ।
प्रथम गुरु माँ ही होती है,और बच्चे की शिक्षा संस्कार माँ के पेट से शुरू हो जातें हैं ।परमात्मा को साक्षी मानकर पल पल अपने बच्चे का निर्माण करना होता है ।ये नौ महीने जितना अंतर्ध्यान रहोगे उतना ही अच्छा होगा।बाहरी दुनिया के कलह क्लेश तो आजीवन चलते रहेंगे किंतु एक माँ का कर्तव्य है कि पेट में पल रहे बच्चे को हर बुराई और अच्छाई से अवगत कराती रहे।


यदि ये नौ महीने आप पूरी निष्ठा से निभाती हो यकीन मानो बाकि बच्चा जीवन बच्चे पर ज़्यादा मेहनत नही करनी पड़ेगी ।ॐ श्री गोविंदाय नम: । ये महा मंत्र बहुत फलदायक है ।


ॐनम:शिवाय रोज़ लिखना भी अच्छा रहता है।लड़का या लड़की दोनो की ही जन्म के उपरान्त समय समय पर सही मार्ग दर्शन बहुत ज़रूरी है,स्कूलों के भरोसे कभी भी बच्चो को नहीं छोड़ सकते,वहाँ केवल डिग्री ही मिलेगी उससे ज़्यादा कुछ नही।


रावण संहिता में स्वयं रावण ने लिखा है कि जो माँ बाप अपने बच्चों को सही और ग़लत की शिक्षा नही देते वह चाहे कितने ही पुण्य कर्म कर लें वह मरने के बाद नर्क में ही जातें हैं ।


बच्चो को केवल जन्म देकर अच्छा जीवन अच्छा खाना देना ही आपका काम नहीं है ।आप औलाद के रूप में समाज में एक प्राणी भी छोड़ रहे हो,उसके द्वारा किया गया हर अच्छा बुरा योगदान आपके कर्म बनाता बिगाड़ता है,आपकी परवरिश आने वाले समय में समाज देश और दुनिया के काम आ सकती है ।

और यहाँ ये दायरा कितना ही छोटा क्यूं न हो जाए कम से कम आपकी दी हुई शिक्षा उसके जीवन में तो उसके काम आएगी ।आपकी बेटी या बेटा आगे चलकर एक अन्य परिवार समाज और संसार का निर्माण करेगें जिसकी हर अच्छाई बुराई में आपका और आपकी परवरिश का ही प्रतिबिंब चमकेगा ।सिर्फ़ बीज डालने से बात नही बनेगी उसमें अच्छी परवरिश का खाद पानी देना भी ज़रूरी है ।


“बस इतना ही करना है “
सप्रेम
डा०सुधा(रेकी ग्रेंड मास्टर)

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