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उत्तराखंड जागेश्वर धाम चितई गोलू देवता की यात्रा

माघ का महीना था और हम लोगों ने सोचा था की बागेश्वर के माघ मेले में जायेंगे | जैसे प्रयागराज में माघ मेला लगता है एक माह का वैसे ही उत्तराखंड में भी १ माह का माघ मेला बागेश्वर में लगता है जहां पर की दो नदियों का संगम है | लेकिन जैसे भोले बाबा को अपने पास बुलाना था तो प्रोग्राम बागेश्वर से जागेश्वर का हो गया | हमारे इष्ट मित्र विपुल जी इस कार्य में हमारे निमित्त बने और साथ ही इस यात्रा से उनका भी एक मन का भार हल्का हो गया |एक ज़रा से बच्ची आरती भी हमारे साथ चल पड़ी |
सुबह सुबह ८ बजे यात्रा का प्रारंभ हुआ और एक विशेष प्रकार की खिचड़ी जिसे मेथी खिचड़ी कहा जाता है और जो की सर्दियों के लिए बहुत अच्छी होती है वो खाने को मिली | विपुल जी को पर्वतीय मार्गों पर भ्रमण का बहुत वर्षों का अनुभव है अतः चिंता की कोई बात नहीं है सोच कर मैं सो गया था |
कुछ देर में आवाज़ से नींद खुली तो देखा की हमारे नीचे बादल बह रहे थे | एक क्षण को लगा की कहीं कार पलट तो नहीं गयी लेकिंग तुरंत ही चैतन्यता वापस आ गयी | ऐसा अद्भुत द्रश्य जीवन में पहले कभी नहीं देखा था |



वहाँ से आगे बढे तो चितई आया जहां पर गोलू देवता का मंदिर है | गोलू देवता को न्याय का देवता बोला ही नहीं माना भी जाता है और उनके मानने वाले पूरे विश्व में असंख्य उत्तराखंडी ही नहीं अनेक लोग हैं | उनको न्याय का देवता इसलिए कहा जाता है की अगर कोई किसी के साथ गलत करता है और उस व्यक्ति को बहुत बुरा लग जाता है तो वह व्यक्ति इस मंदिर में आकर अर्जी देता है की मेरे साथ गलत हुआ है और कुछ ही दिन में जिसने गलत करा होता है उसको उसके करे का परिणाम भुगतना पड़ता है | ऐसा होता ही है | गोलू देवता से लोग बहुत प्रेम तो करते ही हैं उनसे बहुत डरते भी है और साथ ही भरोसा भी साँसों की तरह ही करते हैं |
मान्यताओं के अनुसार गोलू देवता स्वयं शिव जी के रूप अथवा अवतार हैं | कुमाऊं के इश्वर स्वयं शिव हैं और गोलू देवता उनके अवतार हैं , लेकिन कुछ का मानना है की गोलू देवता चंद राजा बाज बहादुर जिनका शासन काल १६३८ से १६७८ तक था उनकी सेना में सेनापति थे | एक युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुए थे और उनकी याद में यह मंदिर बनाया गया था | यह मंदिर अल्मोड़ा से ८ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | हर वर्ष अनेक लोग इस मंदिर में न सिर्फ दर्शन के लिए आते हैं बल्कि अपनी अर्जी कागज़ पर लिख कर लाते हैं , बहुत से श्रद्धालु स्टाम्प पेपर पर भी बाकायदा सील ठप्पे लगवा कर नोटरी करवा कर अपनी फ़रियाद यहाँ पर लगाते हैं |







विपुल जी आरती और सुधा जी चितई गोलू देवता मंदिर उत्तराखंड
इसको घंटियों वाला मंदिर भी कह सकते है क्योंकि यहाँ लाखों घंटियाँ तंगी हुई हैं | यहाँ घंटी चढाने की मान्यता है और सभी श्रद्धालु यहाँ पर घंटियाँ चढाते हैं | आपका भी कोई काम नहीं हो पा रहा किसी प्रकार की समस्या है जो कहीं से भी दूर नहीं हो पा रही है और आप हताश हो चुके हैं तो मेरी सलाह है की आप यहाँ एक बार अवश्य आयें |
यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी अभी तो हमको वहाँ से भी आगे जागेश्वर धाम जाना था सो हम सब निकल पड़े | लेकिन पता चला की विपुल जी की बहुत समय से गोलू देवता जी के मंदिर आने की इच्छा थी | उनके मन में कोई बात थी जो वो करना चाह रहे थे और आज के दिन उनके मन का भी कुछ बोझ हल्का हो गया|

तो सभी एक दूसरे के निमित्त मात्र हुए और बुलाने वाले चितई गोलू देवता और जागेश्वर धाम के शिव जी हुए|

बहुत ही खतरनाक और जोखिम भरी सड़क से होते हुए हम किसी प्रकार से जागेश्वर धाम पहुँच ही गए और मैंने इश्वर का धन्यवाद करा की वाहन मैंने नहीं चलाया नहीं तो न ही कोई पहुँच पाता और वापस आने का प्रश्न ही नहीं होता | सभी इश्वर के पास आत्मा रूप में पहुँच चुके होते |

जागेश्वर धाम पहुँच कर मन में जो आनंद और भक्ति का समागम हुआ उसके लिए कोई शब्द ही उपयुक्त नहीं प्रतीत होता है | पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के ताड़केश्वर  मंदिर की अनुभूति यहाँ भी हुई | शिव जी के सभी स्थान ऊंचे पहाड़ों पर ही होते हैं और क्यों होते हैं ये जब आप वहां पहुँच जाते हैं तभी आपको इसका पता लगता है | मन एक शांत चित्त होकर स्थिर हो जाता है | कोई विचार अपना प्रवाह नहीं बना पाता और मन में सिर्फ शिव जी छवि घर कर जाती है |

जागेश्वर धाम लगभग १०० मंदिरों का समूह है जो कि बहुत छोटे छोटे मंदिर हैं | यह मंदिर सातवीं से बारवीं शताब्दी के बीच के माने जाते हैं | विकीपीडिया के अनुसार "भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग २५० छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी shilaon से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है|"

यहाँ बहुत सारे मंदिर हैं और कुबेर मंदिर है , अन्नपूर्णा देवी का मंदिर है और ढेर सारे शिव मंदिर हैं | जब भी आप जाएँ तो ध्यान रखें की वाहन की सुविधा अत्यंत आवशयक है जिस से की आप मंदिर के एकदम पास तक जा सकें | बस का प्रयोग करने से अच्छा होगा की आप टैक्सी किराए पर ले लें और अगर आपके पास अपना वाहन है तो फिर कोई बात ही नहीं है |









जागेश्वर धाम अल्मोड़ा उत्तराखंड कैसे पहुंचे : 

रेल : दिल्ली से शताब्दी, रानी खेत, और संपर्क क्रांति एक्सप्रेस चलती हैं जो आपको काठगोदाम स्टेशन तक लेकर आती हैं | इसके आगे रेल नहीं है | यहाँ से आपको ढेर सारी बस टैक्सी शेयर टैक्सी मिल जाती हैं |  आपको यह ध्यान रखना है कि आने जाने की व्यवस्था काठ गोदाम से ही कर के चलें | बीच में से करेंगे या एक तरफ की ही गाडी करेंगे तो आपको समस्या हो सकती है | अतः सावधानी रखें |आप अल्मोड़ा में जाकर रुक सकते हैं और वहां से आगे की व्यवस्था कर सकते हैं |

बस: आपको नई दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे से हल्द्वानी के लिए अनेक बसें मिल जायेंगी जो की हल्द्वानी उतार देंगी | आप अल्मोड़ा की बस लेकर सीधे अल्मोड़ा भी जा सकते हैं और वहां होटल आदि में रुकने की व्यवस्था कर के अल्मोड़ा से टैक्सी आदि ले सकते हैं और यह आपको अधिक सस्ता भी पड़ सकता है | 

वायु : अल्मोड़ा के नजदीकी हवाई अड्डा, एक प्रसिद्ध कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर में स्थित है, जो जागेश्वर से लगभग १६७ और अल्मोड़ा से लगभग 127 किलोमीटर दूर है।

कब जायें : अगर आप सावन का महीना छोड़ देंगे तो आपका ही भला होगा क्योंकि आप भीड़ से बच जायेंगे लेकिन लोग यहाँ सावन के महीने में ही आते हैं और शिव जी का अभिषेक करते हैं | इस मंदिर की बहुत ही अधिक मान्यता है |

उत्तराखंड देवभूमि है | यहाँ के कण कण में सिद्ध पुरुषों की ऊर्जा आप महसूस कर सकते हैं | यहाँ अनेक मंदिर हैं और सिद्ध तपस्वियों के स्थल हैं | देव भूमि उत्तराखंड में आपका स्वागत है |

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