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मैंने सत चुगा है : सुधा की मन तरंग

कभी आपने देखा है किसी पक्षी को दाना चुगते हुए ? पेड़ पर लगा हुआ फल हो , मिटटी में सना हुआ दाना हो , मवेशी की पीठ पर बैठे हुए कीड़े मकोड़े , पानी में बहती हुई मछली , या सड़क पर मृत जानवर -- वो उस तत्व को चुग ही लेता है जिससे उसको जीवन मिला या मिलता है | उसका लक्ष्य हर परिस्थिति में जीवन प्राप्त करना होता है और उसे रूप रंग गुण से कोई सरोकार नहीं होता है | अपनी प्रकृति के अनुसार वह अपना जीवन जीता है |

मानव जीवन में सुख शांति , सद्भाव , परस्पर अपने विपरीत भावों में मिले जुले पड़े हुए हैं | हमारा काम है उनमें से अच्छाई चुग कर निकालना | पिता की कठोरता में हमें स्नेह मिलता है, माँ की गाली में प्यार , गुरु के दंड में शिक्षा है | हमारा ध्येय ही हमें सत की प्राप्ति कराता है |

संसार हर भाव से परिपूर्ण है चाहे वह अच्छाई बुराई हो , सत्य असत्य हो, अँधेरा उजाला है | हम इसमें से क्या चाहते हैं और क्या वास्तव में उसको पा लेने की क्षमता हमारे अन्दर है ?  जैसे कोई शिक्षक बहुत कठोर हो , लेकिन उसका ज्ञान को समझाने का तरीका बहुत साधारण हो तो उसके कठोर व्यवहार को त्याग कर उसके साधारण सिखाने को ग्रहण कर लेना चहिये | वो तरीका ही दाना है जो ज्ञान देता है |

कोई पडोसी बहुत ही दुर्व्यवहार भले ही करता हो लेकिन भोजन सभी में बाँट कर खाता हो तो वो बांटना ही उसके दिया हुआ दाना है , हमको उसे ग्रहण करना चहिये |

कोई बहुत नशा करता है, अवारागर्दी करता है , लड़ता है लेकिन जब किसी को मदद चाहिए तो सबसे पहले वही आकर खड़ा होता है तो उसका तो उसका वो मदद का भाव ही हमारा दाना होना चहिये |
पत्नी दिन भर बडबड करती हो लेकिन घर का पूरा ध्यान रखती हो तो उसका बडबडाना मिटटी है और ख्याल रखना दाना |

पति बहुत मेहनती है, सारी ज़िम्मेदारी निभाता है लेकिन प्रेम का प्रदर्शन नहीं करता तो उसका निभाना ही दाना है और इसकी सख्ती मिटटी है |

प्रेयसी के साथ भीड़ भरी बस में चढ़ना उस प्रेयसी को आपके पास भी तो कर देता है , येही दाना है और भीड़ मिटटी है |

जीवन में यदि सबने आपसे अपना काम निकाल कर आपको हटा दिया तो भी आपको यह याद रखना चाहिए की आप कितनों के काम आये |

अपने सत का पोषण करना और दूसरों के सत को धारण करना ही जीवन है | सुख का दाना चुगना ही जीवन है | सुख हर कण में विद्यमान है, इश्वर ने स्वयं को हर जगह स्थापति करके रखा हुआ है |

एक समय के बाद अपना दाना चुगना स्वयं को सीखना ही होता है जैसे माता पिता का सानिध्य बहुत सुख देता है किन्तु एक समय बाद वह नहीं रहता | आगे स्वयं को ही जीना होता है |

बचपन बहुत अच्छा होता है जैसे प्रेयसी की एक झलक पाने के लिए सुबह जल्दी उठ कर नहा कर उसकी एक झलक देखने का सुख | इतनी मशक्कत के बात एक झलक पाने का सुख चुग लेना यह बाद में नहीं मिलता है|

बहुत बार बड़े होकर यह सोच लेते हैं की कोई और चुग कर थाली में रख देगा | ऐसा कभी होता है, सबका सुख अलग है , सबकी परिभाषा अलग है|

अपने सुख का निर्धारण खुद कीजिये और उसको चुगना शुरू कीजिये | यह कठिन लग सकता है मगर होता नहीं है | परिस्थिति चाहे जो भी हो लेकिन मुझे उसमें से सुख चुगना है , मुझे आनंद निकालकर लाना है | वही मेरी भूख है | वही जीवन का अमृत है |

मेरे जीवन का एकमात्र रस जिससे मुझे जीवन की शक्ति मिलती है , ऊर्जा मिलती है , यह मेरी वही ऊर्जा है जिससे मैं लोगों को सुख बाँट सकता हूँ क्योंकि अब मैं उस से परिपूर्ण हूँ |

मैं भर चुका हूँ और अब दे रहा हूँ , सुख शांति , प्रेम , आनंद सब यहीं था मैंने चुग लिए और अब खुद को भरने के बाद दूसरों में बाँट रहा हूँ या रही हूँ |





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